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त्‍योहार

ईद-उल-जुहा

ईद-उल-जुहा (बकर-ईद) अत्‍यधिक खुशी, विशेष प्रार्थनाओं और अभिवादन करने का त्‍यौहार है और इस मुसलिम त्‍यौहार पर उपहार दिए जाते हैं। ईद-उल-जुहा, कुर्बानी का त्‍यौहार, भारत व विश्‍व में परंपरागत धर्मोत्‍साह और उल्‍लास के साथ मनाया जाता है। इसे, अरबी भाषा में ईद-उल-जुहा और भारतीय उप महाद्वीप में उर्दू में बकर-ईद कहा जाता है, क्‍योंकि इस दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती है।

इस्‍लामी विश्‍वास के अनुसार, इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए अल्‍लाह ने उसे अपने बेटे की कुर्बानी देने का हुक्‍म दिया। अत: मक्‍का के नज़दीक मीना के पहाड़ पर इस्‍माइल को वेदी पर चड़ाने से पहले, उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। जब अपना काम पूरा करने के बाद पट्टी हटाई तो उसने अपने पुत्र को अपने सामने जिन्‍दा खड़ा हुआ देखा। बेदी पर कटा हुआ मेमना पड़ा हुआ था। इस अवसर पर आनन्‍दपूर्ण उत्‍सव व संतुलित धार्मिक अनुष्‍ठान किए जाते हैं। इस त्‍यौहार के तीन दिनों में से एक दिन, प्रत्‍येक ऐसे मुसलमान द्वारा जिसके पास 400 ग्राम या इससे अधिक सोना है, बकरा, भेड़ अथवा कोई भी चौपाया पशु कुर्बान किया जाना अपेक्षित है। यह अल्‍लाह व उसके हुक्‍म के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। ईद की नमाज के बाद कुर्बानी का गोश्‍त वितरित किया जाता है व मिलकर खाया जाता है।

यह त्‍यौहार हज (सऊदी अरब के मक्‍का की धार्मिक यात्रा) के पूरा होने का भी प्रमाण है।