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राष्ट्रीय अकादमी

ललित कला अकादमी

भारतीय कला के प्रति देश-विदेश में समझ बढ़ाने और प्रचार-प्रसार के लिए सरकार ने नई दिल्‍ली में 1954 में ललित कला अकादमी (नेशनल अकादमी ऑफ आर्ट्स) की स्‍थापना की थी। अकादमी के लखनऊ, कोलकाता, चेन्‍नई, नई दिल्‍ली और भुवनेश्‍वर में क्षेत्रीय केंद्र हैं जिन्‍हें राष्‍ट्रीय कला केंद्र के नाम से जाना जाता है। इन केंद्रों पर पेंटिंग, मूर्तिकला, प्रिंट-निर्माण और चीनी मिट्टी की कलाओं के विकास के लिए कार्यशाला-सुविधाएं उपलब्‍ध हैं।

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संगीत नाटक अकादमी

संगीत नाटक अकादमी (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं), नृत्‍य और नाटक की राष्‍ट्रीय अकादमी है जिसे आधुनिक भारत को निर्माण प्रक्रिया में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में याद किया जा सकता है, जिससे भारत को 1947 में स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हुई थी। कलाओं के क्षणिक गुण-स्‍वभाव तथा उनके संरक्षण की आवश्‍यकता को देखते हुए इन्‍हें लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में इस प्रकार समाहित हो जाना चाहिए कि समान्‍य व्‍यक्‍ति को इन्‍हें सीखने, अभ्‍यास करने और आगे बढ़ाने का अवसर प्राप्‍त हो सके। बीसवीं सदीं के शुरू के कुद दशकों में ही कलाओं के संरक्षण और विकास का दायित्‍व सरकार का समझा जाने लगा था।

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राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय

राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) दुनिया में रंगमंच का प्रशिक्षण देने वाले श्रेष्‍ठतम संस्‍थानों में से एक है तथा भारत में यह अपनी तरह का एकमात्र संस्‍थान है जिसकी स्‍थापना संगीत नाटक अकादमी ने 1959 में की थी। इसे 1975 में स्‍वायत्त संगठन का दर्जा दिया गया जिसका पूरा खर्च संस्‍कृति विभाग वहन करता है। राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय का उद्देश्‍य रंगमंच के इतिहास, प्रस्‍तुतिकरण, दृश्‍य डिजाइन, वस्‍त्र डिजाइन, प्रकाश व्‍यवस्‍था और रूप-सज्‍जा सहित रंगमंच के सभी पहलुओं का प्रशिक्षण देना है। इस विद्यालय में प्रशिक्षण पाठ्यक्रम की अवधि तीन वर्ष है और हर वर्ष पाठ्यक्रम में 20 विद्यार्थी लिए जाते हैं। प्रवेश पाने के इच्‍छुक विद्यार्थियों को दो चरणों में से गुजरना पड़ता है। राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय के डिप्‍लोमा को भारतीय विद्यालय संघ की ओर से एम.ए. की डिग्री के बराबर मान्‍यता प्राप्‍त है और इसके आधार पर वे कॉलेजों/विश्‍वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्‍त किए जा सकते हैं अथवा पीएच.-डी. (डॉक्‍टरेट) उपाधि के लिए पंजीकरण करा सकते हैं।

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साहित्‍य अकादमी

साहित्‍य अकादमी (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) विभिन्‍न भाषाओं की कृतियों की राष्‍ट्रीय अकादमी है। इसका उद्देश्‍य प्रकाशन, अनुवाद गोष्‍ठियां, कार्यशालाएं आयोजित करके भारतीय साहित्‍य के विकास को बढ़ावा देना है। इसके तहत देशभर में सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम और साहित्य सम्मेलन भी आयोजित किए जाते हैं। अकादमी की स्‍थापना 1954 में स्‍वायत्त संस्‍था के रूप में की गई थी और इसके लिए धन की व्‍यवस्‍था भारत सरकार का संस्‍कृति विभाग करता है। अकादमी का समिति के रूप में पंजीकरण 1956 में हुआ था। अकादमी ने 24 भाषाओं को मान्‍यता दे रखी है। प्रत्‍येक भाषा के लिए एक सलाहकार बोर्ड है जो संबद्ध भाषा के कामकाज और प्रकाशान के बारे में सलाह देता है। अकादमी के चार क्षेत्रीय बोर्ड हैं जो उत्तर, पश्‍चिम, पूर्व और दक्षिण की भाषाओं के बीच तालमेल और परस्‍पर आदान-प्रदान को प्रोत्‍साहन देते हैं। अकादमी का मुख्‍यालय नई दिल्‍ली में है तथा कोलकाता, मुंबई, बैंगलोर और चेन्‍नई में भी इसके कार्यालय हैं। अकादमी के बैंगलोर और कोलकाता में दो अनुवाद केंद्र भी हैं। मौखिक और जनजातीय साहित्‍य को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से शिलांग में अकादमी का परियोजना कार्यालय स्‍थित है तथा दिल्‍ली में भारतीय साहित्‍य का अभिलेखागार है। नई दिल्‍ली में ही अकादमी का अनूठा बहुभाषीय पुस्‍तकालय भी है जिसके क्षेत्रीय कार्यालय बैंगलोर और कोलकाता में हैं। इनमें 25 से ज्‍यादा भाषाओं की करीब डेढ़ लाख पुस्‍तकों का संग्रह है

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